शनिवार, 16 मार्च 2024

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा (भीमराव अंबेदकर) class 10 BSEB

 गद्य खंड

 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा (भीमराव अंबेदकर)  video


लेखक-परिचय-मानव मुक्ति के पुरोधा भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई. में मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। ये प्रारंभिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश से प्रोत्साहन पाकर उच्च शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क (अमेरिका) फिर वहाँ से लंदन (इंग्लैंड) गए। इन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक तथा पूरा वैदिक वाङ्मय अनुवाद के जरिए पढ़ा और ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत की। इस प्रकार वे इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, समाजशास्वी, अर्थशास्वी, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे। कुछ दिनों तक वकालत करने के बाद राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए इन्होंने अछूतों, स्त्रियों तथा मजदूरों को मानवीय अधिकार तथा सम्मान दिलाने के लिए अधक संघर्ष किया। इनका निधन 1956 ई. में हुआ।

रचनाएँ- 'द कास्ट्स इन इंडिया देयर मेकेनिज्म', 'जेनेसिस एंड डेवलपमेंट', 'द अनटचेबल्स', 'हू आर दे', 'हू आर द शूद्राज', 'बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म', 'बुद्धा एंड हिज धम्मा', 'चाट्स ऑन लिग्युस्टिक स्टेट्स', 'द एबोलुशन ऑफ प्रोबिशियल फाइनांस', 'द राइज एंड फॉल ऑफ हिन्दू वीमैन', 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट'। हिंदी में इनका संपूर्ण वाङ्मय भारत के कल्याण मंत्रालय द्वारा 'बाबा साहेब अंबेदकर संपूर्ण वाङ्मय' 21 खंडों में प्रकाशित कराया जा चुका है।

साहित्यिक-विशेषताएँ आधुनिक भारतीय चिंतकों में। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन्होंने जीवन भर दलितों की मुक्ति तथा सामाजिक समता के लिए संघर्ष किया। इनका सारा लेखन इसी संघर्ष से जुड़ा हुआ है। इन्होंने व्यापक अध्ययन एवं चिंतन के बल पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक नई अन्तर्वस्तु भरने का काम किया। बुद्ध, कबीर तथा ज्योतिबा फुले इनके चिंतन एवं रचनात्मकता के प्रमुख प्रेरक थे। इनकी बहुमुखी विद्वता एकांत ज्ञान-साधना की जगह मानव-मुक्ति एवं जनकल्याण के लिए थी।

पाठ-परिचय-प्रस्तुत पाठ 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' लेखक के विख्यात भाषण 'एनौहिलेशन ऑफ कास्ट' का अंश है। यह भाषण जाति-पॉति तोड़क मंडल के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था। इसमें लेखक ने जातिवाद के आधार पर की जाने वाली असमानता का तार्किक विरोध किया है। लेखक की मान्यता है कि आदर्श समाज में समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुता इन तीनों तत्त्वों का होना आवश्यक होता है।

पाठ-सारांश प्रस्तुत पाठ 'श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा में लेखक ने जातीय आधार पर की जाने वाली असमानता के विरुद्ध अपना विचार प्रकट किया है। लेखक का कहना है कि आज के परिवेश में भी कुछ लोग 'जातिवाद' के कटु समर्थक है। उनके अनुसार कार्यकुशलता के लिए श्रमविभाजन आवश्यक है, क्योंकि जातिप्रथा श्रमविभाजन का ही दूसरा रूप है। लेकिन लेखक की आपत्ति है कि जातिवाद श्रम विभाजन के साथ- साथ श्रमिक विभाजन का रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन किसी भी सभ्य समाज के लिए आवश्यक है। परन्तु भारत की जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है और इन विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है।
जाति-प्रथा को यदि श्रमविभाजन मान भी लिया जाए, तो यह स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है। इसलिए सक्षम समाज का कर्तव्य है कि वह व्यक्तियों को अपनी रूचि या क्षमता के अनुसार पेशा अथवा कार्य चुनने के योग्य बनाएं। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धान्त यह है कि इससे मनुष्य के माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पेशा अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि जीवन भर के लिए मनुष्य को एक ही पेशे में बाँध भी देती है। इसके कारण यदि किसी उद्योग-धंधे या तकनीक में परिवर्तन हो जाता है तौ लोगों को भूखों मरने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है, क्योंकि खास पेशे में बँधे होने के कारण वह बेरोजगार हो जाता है। जाति-प्रथा से किया गया श्रम विभाजन किसी की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता। इसका आधार व्यक्तिगत न होकर 'पूर्व लेख' होता है। फलतः लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ विवशतावश करते हैं। ऐसे लोग टालू मानसिकता के कारण न तो दिल लगाकर काम करते हैं और न ही उन्हें कार्य-कुशलता आती है। इस प्रकार जाति-प्रथा व्यक्ति की स्वाभाविक प्रेरणारुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें स्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।
                                                समाज के रचनात्मक पहलू पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुन बहुतों द्वारा प्रश्न पूछा जा सकता है कि मैं जातियों के विरुद्ध हैं। आखिर आदर्श समाज क्या है? वास्तव में आदर्श समाज वह समाज है, जिसमें स्वतंत्रता, समता, भातृत्व को महत्त्व दिया जा रहा हो। समाज में गतिशीलता होनी चाहिए ताकि सामाजिक हितों के लिए उठाए गए कदमों का लाभ समाज के सभी वर्गो को मिल सके। परस्पर भाईचारा ऐसा हो जैसा दूध और पानी आपस में मिल जाते हैं। वास्तव में यही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में समाज के सभी लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव होता है।

अनुसार कार्यकुशलता के लिए श्रमविभाजन आवश्यक है, क्योंकि जातिप्रथा श्रमविभाजन का ही दूसरा रूप है। लेकिन लेखक की आपत्ति है कि जातिवाद श्रम विभाजन के साथ- साथ श्रमिक विभाजन का रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन किसी भी सभ्य समाज के लिए आवश्यक है। परन्तु भारत की जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है और इन विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है।

जाति-प्रथा को यदि श्रमविभाजन मान भी लिया जाए, तो यह स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है। इसलिए सक्षम समाज का कर्त्तव्य है कि वह व्यक्तियों को अपनी रूचि या क्षमता के अनुसार पेशा अथवा कार्य चुनने के योग्य बनाए। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धान्त यह है कि इससे मनुष्य के माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पेशा अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि जीवन भर के लिए मनुष्य को एक ही पेशे में बाँध भी देती है। इसके कारण यदि किसी उद्योग-धंधे या तकनीक में परिवर्तन हो जाता है तौ लोगों को भूखों मरने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है, क्योंकि खास पेशे में बँधे होने के कारण वह बेरोजगार हो जाता है। जाति-प्रथा से. किया गया श्रम विभाजन किसी की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता। इसका आधार व्यक्तिगत न होकर 'पूर्व लेख' होता है। फलतः लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ विवशतावश करते हैं। ऐसे लोग टालू मानसिकता के कारण न तो दिल लगाकर काम करते हैं और न ही उन्हें कार्य-कुशलता आती है। इस प्रकार जाति-प्रथा व्यक्ति की स्वाभाविक प्रेरणारुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें स्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।

समाज के रचनात्मक पहलू पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुन बहुतों द्वारा प्रश्न पूछा जा सकता है कि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ। आखिर आदर्श समाज क्या है ? वास्तव में आदर्श समाज वह समाज है, जिसमें स्वतंत्रता, समता, भ्रातृत्व को महत्त्व दिया जा रहा हो। समाज में गतिशीलता होनी चाहिए ताकि सामाजिक हितों के लिए उठाए गए कदमों का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिल सके। परस्पर भाईचारा ऐसा हो जैसा दूध और पानी आपस में मिल जाते हैं। वास्तव में यही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में समाज के सभी लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान •का भाव होता है।


गोधूलि class 10



बोध और अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर

पाठ के साथ :

श्रम विभाजन और जाति-प्रथा SUBJECTIVE 

1. लेखक किस विंडवना कि बात करते है विंडवना का स्वरुप क्या है

उतर:- लेखक भीमराव अम्बेडकर जी वींड्वना कि बात करते हुए कहते है कि इस युग मे जातिवाद के पोषको कि कमी नहींहै जिसका स्वरुप है कि जतिप्रथा श्रम विभाजन के साथ- साथ श्रमिक विभाजन का भी रुप ले रखा है , जो अस्वभविक है।


2. जातिवाद के पोषक उसके पक्ष मे क्या तर्क देते है

उतर:-  जातिवाद के पोषको का तर्क है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्य कुशलता के लिए श्रम विभाजन आवश्यक मानता है और जाति प्रथा श्रम विभाजन का ही रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है।


3. जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्को पर लेखक की प्रमुख आपत्तियाँ क्या है ?

उतर:-  जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्क पर लेखक के प्रमुख आपतियाँ इस प्रकार है कि जाति प्रथा श्रम विभाजन का रूप ले लिया है और किसी सभ्य समाज में श्रम विभाजन व्यवस्था श्रमिकों के विभिन्न पहलुओं में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करता है ।


4. जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती है ?

उतर:- भारतीय समाज में जातिवाद के आधार पर श्रम विभाजन और अस्वाभाविक है क्योंकि जातिगत श्रम विभाजन श्रमिकों की रुचि अथवा कार्यकुशलता के आधार पर नहीं होता, बल्कि माता के गर्भ में ही श्रम विभाजन कर दिया जाता है जो विवशता ,अरुचिपूर्ण होने के कारण गरीबी और अकर्मव्यता को बढ़ाने वाला है ।


5. जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है ?

उतर:- जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण है क्योंकि भारतीय समाज में श्रम विभाजन का आधार जाति है चाहे श्रमिक कार्य कुशल हो या नहीं उस कार्य में रुचि रखता हो या नहीं इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जब श्रमिकों कार्य करने में न दिल लगे ना दिमाग तो कोई कार्य कुशलता पूर्वक कैसे प्राप्त कर सकता है यही कारण है कि भारत में जतिप्रथा बेरोजगारी का प्रत्यक्ष और प्रमुख कारण बना हुआ है ।


6. लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या किसे मनते है, और क्यो ?

उतर:- लेखक भीमराव अंबेडकर आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या लोगों का निर्धारित कार्य को मानते हैं ,क्योंकि अरुचि और विवस्ता वस मनुष्य काम को टालने लगता है और कम काम करने के लिए प्रेरित हो जाता है। ऐसी स्थिति में जहां काम करने में नद दिल लगे ना दिमाग तो कोई कुशलता कैसे प्राप्त कर सकता है ।


7. लेखक ने पाठ के किन पहलुओं में जाति प्रथा को एक  हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है ?

उतर:- लेखक ने पाठ के विभिन्न पहलुओं में जाति प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है जो इस प्रकार है, अस्वाभाविक श्रम विभाजन ,बढ़ती बेरोजगारी, अरुचि और विवस्ता में श्रम का चुनाव ,गतिशील एवं आदर्श समाज ,तथा वास्तविक लोकतंत्र का स्वरूप, आदि ।


8. सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओ को आवश्यक माना है ?

उतर:- सच्चे लोकतंत्र कि स्थापना के लिए लेखक अनेक विशेषताओं को आवश्यक माना है। बहू विध हितो में सब का भाग समान होना चाहिए सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग होनी चाहिए तात्पर्य है कि हमें समाज में दूध और पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे की भावना होनी चाहिए हमें साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान होनी चाहिए ?


9. श्रम विभाजन और जाति-प्रथापाठ का सारांश लिखें।

उतर:-आज के युग में भी जाति-प्रथा की वकालत सबसे बड़ी बिडंबना है। ये लोग तर्क देते हैं कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का ही एक रूप है। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि श्रम-विभाजन श्रमिक-विभाजन नहीं है। श्रम-विभाजन निस्संदेह आधुनिक युग की आवश्यकता है, श्रमिक-विभाजन नहीं। जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन और इनमें ऊँच-नीच का भेद करती है।

वस्तुत: जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन नहीं माना जा सकता क्योंकि श्रम-विभाजन मनुष्य की रूचि पर होता है, जबकि जाति-प्रथा मनुष्य पर जन्मना पेशा थोप देती है। मनुष्य की रूचि-अरूचि इसमें कोई मायने नहीं रखती। ऐसी हालत में व्यक्ति अपना काम टालू ढंग से करता है, न कुशलता आती है न श्रेष्ठ उत्पादन होता है। चूँकि व्यवसाय में, ऊँच-नीच होता रहता है, अतः जरूरी है पेशा बदलने का विकल्प। चूँकि जाति-प्रथा में पेशा बदलने की गुंजाइश नहीं है,

इसलिए यह प्रथा गरीबी और उत्पीडन तथा बेरोजगारी को जन्म देती है। भारत की गरीबी और बेरोजगारी के मुल में जाति-प्रथा ही है। अतः स्पष्ट है कि हमारा समाज आदर्श समाज नहीं है। आदर्श समाज में । बहविध हितों में सबका भाग होता है। इसमें अवाध संपर्क के अनेक साधन एवं अवसर उपलब्ध होते हैं। लोग दूध-पानी की तरह हिले-मिले रहते हैं। इसी का नाम लोकतंत्र है। लोकतंत्र मूल रूप से सामूहिक जीवन-चर्या और सम्मिलित अनुभवों के आदान प्रदान का नाम है

 


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