शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

CLASS 10 Bihar board #गोधूलि श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा (भीमराव अंबेदकर )

 गद्य खंड

1. श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा    (भीमराव अंबेदकर )

लेखक-परिचय-मानव मुक्ति के पुरोधा भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल,
1891 ई. में मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। ये प्रारंभिक शिक्षा के बाद बड़ौदा नरेश से प्रोत्साहन पाकर उच्च शिक्षा के लिए न्यूयॉर्क (अमेरिका) फिर वहाँ से लंदन (इंग्लैंड) गए। इन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक तथा पूरा वैदिक वाङ्‌मय अनुवाद के जरिए पढ़ा और ऐतिहासिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ प्रस्तुत की। इस प्रकार वे इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे। कुछ दिनो तक वकालत करने के बाद राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए इन्होंने अछूतो, स्त्रियों तथा मजदूरों को मानवीय अधिकार तथा सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया। इनका निधन 1956 ई. में हुआ।
रचनाएँ- 'द कास्ट्स इन इंडिया देयर मेकेनिज्म', 'जेनेसिस एंड डेवलपमेंट', 'द अनटचेबल्स', 'हू आर दे', 'हू आर द शूद्राज', 'बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म', 'बुद्धा एंड हिज धम्मा', 'घाट्स ऑन लिग्युस्टिक स्टेट्स', 'द एबोलुशन ऑफ प्रोबिशियल फाइनांस', 'द राइज एंड फॉल ऑफ हिन्दू वीमैन', 'एनीहिलेशन ऑफ कास्ट'। हिंदी में इनका संपूर्ण वाङ्मय भारत के कल्याण मंत्रालय द्वारा 'बाबा साहेब अंबेदकर संपूर्ण वाङ्‌मय' 21 खंडों में प्रकाशित कराया जा चुका है।
साहित्यिक-विशेषताएँ आधुनिक भारतीय चिंतकों में बाबा साहेब भीमराव
अंबेडकर का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन्होंने जीवन भर दलितों की मुक्ति तथा सामाजिक समता के लिए संघर्ष किया। इनका सारा लेखन इसी संघर्ष से जुड़ा हुआ है। इन्होंने व्यापक अध्ययन एवं चिंतन के बल पर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक नई अन्तर्वस्तु भरने का काम किया। बुद्ध, कबीर तथा ज्योतिबा फुले इनके चिंतन एवं रचनात्मकता के प्रमुख प्रेरक थे। इनकी बहुमुखी विद्वता एकांत ज्ञान-साधना की जगह मानव-मुक्ति एवं जनकल्याण के लिए थी।
पाठ-परिचय-प्रस्तुत पाठ 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' लेखक के विख्यात भाषण 'एनौहिलेशन ऑफ कास्ट' का अंश है। यह भाषण जाति-पाति तोड़क मंडल के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था। इसमें लेखक ने जातिवाद के आधार पर की जाने वाली असमानता का तार्किक विरोध किया है। लेखक की मान्यता है कि आदर्श समाज में समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुता इन तीनों तत्त्वों का होना आवश्यक होता है।
पाठ-सारांश प्रस्तुत पाठ 'श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा' में लेखक ने जातीय आधार पर की जाने वाली असमानता के विरुद्ध अपना विचार प्रकट किया है। लेखक का कहना है कि आज के परिवेश में भी कुछ लोग 'जातिवाद' के कटु समर्थक है। उनके 6

अनुसार कार्यकुशलता के लिए श्रमविभाजन आवश्यक है, क्योंकि जातिप्रथा श्रमविभाजन का ही दूसरा रूप है। लेकिन लेखक की आपत्ति है कि जातिवाद श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन किसी भी सभ्य समाज के लिए आवश्यक है। परन्तु भारत की जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है और इन विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है।
जाति-प्रथा को यदि श्रमविभाजन मान भी लिया जाए, तो यह स्वाभाविक नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की रूचि पर आधारित नहीं है। इसलिए सक्षम समाज का कर्त्तव्य है कि वह व्यक्तियों को अपनी रूचि या क्षमता के अनुसार पेशा अथवा कार्य चुनने के योग्य बनाए। इस सिद्धांत के विपरीत जाति-प्रथा का दूषित सिद्धान्त यह है कि इससे मनुष्य के माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार पेशा अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि जीवन भर के लिए मनुष्य को एक ही पेशे में बाँध भी देती है। इसके कारण यदि किसी उद्योग-धंधे या तकनीक में परिवर्तन हो जाता है तौ लोगों को भूखों मरने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता है, क्योंकि खास पेशे में बँधे होने के कारण वह बेरोजगार हो जाता है। जाति-प्रथा से किया गया श्रम विभाजन किसी की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता। इसका आधार व्यक्तिगत न होकर 'पूर्व लेख' होता है। फलतः लोग निर्धारित कार्य को अरुचि के साथ विवशतावश करते हैं। ऐसे लोग टालू मानसिकता के कारण न तो दिल लगाकर काम करते हैं और न ही उन्हें कार्य-कुशलता आती है। इस प्रकार जाति-प्रथा व्यक्ति की स्वाभाविक प्रेरणारुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें स्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।
समाज के रचनात्मक पहलू पर विचार करते हुए लेखक कहता है कि मेरे द्वारा जाति प्रथा की आलोचना सुन बहुतों द्वारा प्रश्न पूछा जा सकता है कि मैं जातियों के विरुद्ध हूँ। आखिर आदर्श समाज क्या है? वास्तव में आदर्श समाज वह समाज है, जिसमें स्वतंत्रता, समता, भातृत्व को महत्त्व दिया जा रहा हो। समाज में गतिशीलता होनी चाहिए ताकि सामाजिक हितों के लिए उठाए गए कदमों का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिल सके। परस्पर भाईचारा ऐसा हो जैसा दूध और पानी आपस में मिल जाते हैं। वास्तव में यही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में समाज के सभी लोगों के प्रति श्रद्धा और सम्मान •का भाव होता है।
शब्दार्थ
(पृष्ठ 2) : विडंबना (सं० पुं०) दुर्भाग्य, आश्चर्य। पोषक ( sqrt(4) 0 )= समर्थक । समर्थन (सं. dot g_{o} )= स्वीकृति । कार्य-कुशलता (सं. स्त्री) .काम करने की क्षमता। विभाजन (सं. पुं०) = बँटवारा। बुराई (सं. स्त्री०) दोष। आपत्तिजनक (\mathfrak{r}_{0}) = परेशानी पैदा करने वाली बात। श्रमिक ( f a )= मजदूर। विभिन्न (H_{0}) = भिन्न-भिन्न प्रकार के। अस्वाभाविक (वि.) = प्रकृति के प्रतिकूल, जो स्वाभाविक न हो। करार देना (क्रि.) = सिद्ध करना, घोषित करना। सक्षम (f*G_{0}) = समर्थ, योग्य। पेशा (सं. पुं०) धंधा, व्यवसाय । विपरीत (वि.) = उलटा, प्रतिकूल । दूषित ( f 4 )= दोषपूर्ण। दृष्टिकोण (सं० पुं०) नजरिया, सोचने का ढंग । स्तर (सं. पं.) = श्रेणी। निर्धारित (f*q_{e}) = निश्चित, तय। पूर्व निर्धारण (स. पु) = पहले से निश्चित। स्थिति (सं. स्वी) दणा। पक्रिया (स. स्त्री) = पद्धति। निरंतर

गोधूलि , वर्ग 10
बोध और अभ्यास : प्रश्न और उनके उत्तर
पाठ के साथ :

प्रश्न 1. लेखक किस विडंबना की बात करता है? विडंबना का स्वरूप क्या है?
उत्तर-लेखक उस विडंबना की बात करता है जिस कारण आज के जाग्रत समाज में जातिवादी विचार फल-फूल रहा है। लेखक का कहना है कि इस युग में भी कुछ लोग जातिवाद के समर्थक और पोषक बने हुए है, जबकि विश्व के किसी समाज में जातिवाद आधारित श्रम-विभाजन नहीं है। लेकिन जातिवाद के पोषक लोग कार्यकुशलता के लिए इसे आवश्यक मानते हैं। विडंबना का मुख्य कारण यही है, क्योंकि इससे नीच-ऊँच की भावना बलवती होती है और मनुष्य को जन्म से ही किसी काम-धंधे में बाँध देती है। फलतः उसकी रूचि एवं क्षमता का हनन होता है।
विडंबना का स्वरूप यही है कि समाज को श्रम के आधार पर वर्ण व्यवस्था को स्थायी बना दिया गया है।

प्रश्न 2. जातिवाद के पोषक उसके पक्ष में क्या तर्क देते हैं?
उत्तर-जातिवाद के पोषकों का कहना है कि कर्म के अनुसार जाति का विभाजन हुआ था। इस विभाजन से लोगों में वंशगत व्यवसाय में निपुणता आती है अर्थात् कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। आधुनिक सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानते हैं, जबकि जाति-प्रथा भी श्रमविभाजन का ही एक रूप है।

प्रश्न 3. जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक की प्रमुख आपत्तियाँ क्या हैं?
उत्तर-जातिवाद के पक्ष में दिए गए तर्कों पर लेखक का कहना है कि जाति प्रथा श्रम-विभाजन का स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योकि यह श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का भी विभाजन करती है। यह मनुष्य को जन्म के साथ ही किसी काम-धंधे से बाँध देती है। इस कारण मनुष्य अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम का चुनाव नहीं कर पाता है। साथ ही, समाज में ऊँच-नीच का भेदभाव भी जन्म लेता है। अतएव यह विभाजन सर्वथा अनुचित है।

प्रश्न 4. जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप क्यों नहीं कही जा सकती ?

उत्तर-लेखक के अनुसार जाति भारतीय समाज में श्रम विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं है क्योकि यह मनुष्य की रुचि पर आधारित नहीं है। इसमें व्यक्ति की क्षमता की उपेक्षा होती है। व्यक्ति अपनी रुचि अथवा क्षमता के अनुसार अपना पेशा तथा कार्य का चुनाव नहीं कर सकता। यह व्यवस्था केवल माता-पिता के सामाजिक स्तर का ही ध्यान रखती है, जिस कारण व्यक्ति जीवनभर के लिए किसी निश्चित व्यवसाय से बंध जाता है। फलत काम की कमी जैसे संकट के समय उसे भूखों मरने के लिए विवश होना पड़ता है।

प्रश्न 5. जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण कैसे बनी हुई है ?
उत्तर-जाति प्रथा मनुष्य को जीवन भर के लिए एक पेशे में बाँध देती है। उसे कोई अन्य पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती, भले ही, वह उस पेशे में पारंगत क्यों न हो। आधुनिक युग में उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व तकनीक में निरंतर विकास के कारण कभी-कभी पेशा में भी अकस्मात् परिवर्तन हो जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति को पेशा बदलना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन जाति प्रथा के कारण पेशा बदलने की अनुमति नहीं मिलती है तो भुखमरी तथा बेरोजगारी की समस्या खड़ी हो जाती है। इस प्रकार जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख और प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।

प्रश्न 6. लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या किसे मानता है और क्यों ?
उत्तर-लेखक आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न से भी बड़ी समस्या जाति प्रथा को मानता है। इसका कारण यह है कि इस प्रथा में व्यक्ति की रूचि तथा क्षमता की उपेक्षा की जाती है। व्यक्ति स्वेच्छा से कोई दूसरा पेशा नहीं अपना सकता। फलतः अरुचि तथा विवशता वश काम करने के कारण व्यक्ति की कार्यक्षमता घटने लगती है और वह दुर्भावना से ग्रस्त होकर टालू प्रवृत्ति का हो जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि आर्थिक दृष्टि से भी जाति प्रथा हानिकारक है। यह प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणारूचि तथा आत्म-शक्ति को दबाकर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।

प्रश्न 7. लेखक ने पाठ में किन प्रमुख पहलुओं से जाति-प्रथा को एक हानिकारक प्रथा के रूप में दिखाया है ?
उत्तर-लेखक ने पाठ में जिन प्रमुख पहलुओं से जाति-प्रथा को एक हानिकारक-प्रथा के रूप में वर्णन किया है, वे निम्नलिखित हैं :
जाति-प्रथा पर आधारित श्रम विभाजन स्वाभाविक नहीं है। यह श्रमिकों में भेदभाव पैदा करती है। इस विभाजन से ऊँच-नीच का भेद उत्पन्न होता है, जिससे सामाजिक एकता पर दुष्प्रभाव पड़ता है। यह श्रम विभाजन रूचि आधारित न होने के कारण श्रमिको की कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव डालता है। श्रमिक दुर्भावनाग्रस्त होकर टालू तथा कम काम करने के लिए प्रेरित होता है। यह श्रम-विभाजन मनुष्य को माता-पिता के आधार पर गर्भमें ही पेशा तय कर देता है तथा सदैव के लिए किसी निश्चित व्यवस्मय से बाँध देता है। भले ही वह पेशा अनुपयुक्त तथा अपर्याप्त ही क्यों न हो। इसमें व्यक्ति को पेशा बदलने की अनुमति नहीं मिलती। फलतः व्यक्ति को कभी-कभी भूखों मरने के लिए विवश होना पड़ता है। इस प्रथा के कारण व्यक्ति को घृणित एवं त्याज्य पेशा विवशतावश अपनांना पड़ता है। इसलिए मजबूरी में इन कार्यों को करने वाले व्यक्ति अपने दायित्व का निर्वाह उदासीन भाव से करते हैं।

प्रश्न 8. सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने किन विशेषताओं को आवश्यक माना है?
उत्तर-सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए लेखक ने समाज में स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे की भावना का होना आवश्यक माना है। लेखक का मानना है कि ऐसे ही समाज में सबके कल्याण एवं सहयोग की भावना होती है। समाज के बहुविध हितों में सबका समान भाग होता है। सभी एक-दूसरे की रक्षा के प्रति सजग रहते हैं। ऐसे समाज में इतनी गतिशीलता होती है कि कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे छोर तक संचारित होते रहते हैं। दूध-पानी की तरह भाईचारे का मिश्रण होता है। इसमें सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों का आदान-प्रदान होता रहता है तथा साथियों के प्रति श्रद्धा तथा समानता का भाव रहता है।

नोट : पाठ के आस-पास के प्रश्नों के उत्तर छात्र स्वयं करें।
भाषा की बात :-
प्रश्न 1. पाठ से संयुक्त, सरल एवं मिश्र वाक्य चुनें।
उत्तर :
(i) यह विडंबना की बात है कि इस युग में भी जातिवाद के पोषको की कमी नहीं है।
- संयुक्त वाक्य
(ii) जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान लिया जाए तो यह स्वाभाविक नहीं है।
सरल वाक्य
(iii) समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्यकुशलता के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मनता है और चूंकि जाति प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है।
- मिश्र वाक्य
प्रश्न 2. निम्नलिखित के विलोम शब्द लिखें :
सभ्य, विभाजन, निश्चय, ऊँच, स्वतंत्रता, दोष, सजग, रक्षा, पूर्वनिर्धारण ।
उत्तर : सभ्य असभ्य
विभाजन संगठन, मिश्रण
निश्चय
अनिश्चय
ऊँच
नीच
स्वतंत्रता परतंत्रता, दासता
दोष
गुण
सजग
लापरवाह
रक्षा
असुरक्षा
पूर्व निर्धारण परनिर्धारण
प्रश्न 3. पाठ से विशेषण चुनें तथा उनका स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें।
उत्तर : पोषक दूध में पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
सध्य
सभ्य समाज सदा गतिशील होता है।
स्वाभाविक जाति प्रथा व्यक्ति को स्वाभाविक नियमों के विपरीत जकड़कर निष्क्रिय बना देती है।

कुशल
राम कुशल कलाकार है।
दूषित
दूषित वातावरण में जीना दूभर हो जाता है।
सामाजिक
प्राचीन सामाजिक व्यवस्था जाति प्रथा पर आधारित नहीं थी।
पैतृक
यह मोहन की पैतृक संपत्ति है।
नीरस
आज का कवि सम्मेलन नीरस था।
रचनात्मक
श्याम रचनात्मक कार्यों के प्रति सदैव सजग रहता है।
सजग
सेना देश का सजग प्रहरी है।
शारीरिक
गणेश शारीरिक दृष्टि से कमजोर है, लेकिन मानसिक दृष्टि से नहीं ।
पारिवारिक
सोहन पारिवारिक उलझन के करण परेशान रहता है।
काल्पनिक
पंचतंत्र पशुओं पर आधारित काल्पनिक कथा है।
प्रश्न 4. निम्नलिखित के पर्यायवाची शब्द लिखें ।
दूषित, श्रमिक, पेशा, अकस्मात्, अनुमति, अवसर, परिवर्तन, सम्मान ।
उत्तर :
दूषित
गंदा
श्रमिक
मजदूर
पेशा
व्यवसाय
अकस्मात्
अचानक
अनुमति
स्वीकृति
अवसर
मौका
परिवर्तन
बदलाव
सम्मान
आदर

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