सोमवार, 26 मई 2025

Class 10 पद (रसखान)

 पद रसखान 

कवि-परिचय-हिन्दी साहित्य के कृष्णभक्त कवि रसखान का पूरा नाम सैय्यद इब्राहिम खानखाना बताया जाता है। इनका जन्म 1548 ई. के आसपास राजवंश से संबंधित एक संपन्न पठान परिवार दिल्ली में हुआ था। ये मूलतः मुसलमान थे, फिर भी इन्होंने जीवन पर्यन्त कृष्णभक्ति का गान किया। कृष्ण के प्रति इनकी भक्ति देखकर गोस्वामी बिठ्ठलनाथ जी ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। बाल्यावस्या से ही ये प्रेमी स्वभाव के थे। बाद में यही उत्कट प्रेम ईश्वरीय प्रेम में बदल गया। ऐसी मान्यता है कि इन्हें श्रीनाथजी के मंदिर में कृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए थे। इसी कृष्णदर्शन से उत्प्रेरित होकर ये ब्रजभूमि में रहने लगे और मृत्युपर्यंत वहीं रहे। इनकी मृत्यु आसपास हुई। 1628 ई. के


रचनाएँ-रसखान की मुख्य दो रचनाएँ हैं- सुजान रसखान तथा प्रेमवाटिका । 'सुजान रसखान' में कृष्ण-प्रेम पर आधारित कवित्त एवं सवैये हैं तो प्रेमवाटिका' में प्रेम विषयक दोहे है।


काव्यगत-विशेषताएँ-रसखान ने कृष्णभक्ति में सराबोर होकर अपनी काव्य-


रचना की है। इनकी रचना का विषय कृष्णभक्ति है। इन्होंने कृष्ण से संबद्ध प्रत्येक विषय पर अपने अटूट प्रेम तथा अलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया है। इनकी रचना का वर्ण्य-विषय-कृष्ण का रूप-सौनदर्य, वेशभूषा, मुरली और बालक्रीड़ाएँ है, क्योंकि कृष्ण की जन्मभूमि, बज का यमुनातट, वहाँ के वन-बाग, पशु-पक्षी, पर्वत-नदी आदि से उन्हें अनन्य प्रेम था। वे उसी व्यक्ति के जीवन को धन्य मानते हैं, जो कृष्ण की भक्ति में अपने को समर्पित कर दिया। इस संसार में कृष्ण के सिवाय हर कुछ व्यर्थ है। इनका प्रेम अति पवित्र, निश्छल तथा निवेदन प्रधान है। कृष्ण के प्रति उनकी तन्मयता भक्ति, भावुकता और तल्लीनता देखते ही बनती है।


ये अपनी सुमधुर, सरल एवं सरस भाषा के लिए विख्यात है। इनकी भाषा आडंबरहीन है। अलंकारों का प्रयोग सहज रूप में हुआ है। शब्दों में झरने-सा मधुर प्रवाह एवं गतिशीलता है। दोहा, कवित्त और सवैया तीनों छंदों पर पूरा अधिकार है। सवैये के प्रयोग में इन्होंने रस ही घोल दिया है। इसी विशेषता के कारण रसखान को रस की खान कहा गया है।

(क) प्रेम-अयनि श्री राधिका,प्रेम-अयनि श्री राधिका, प्रेम-बरन नंदनंद ।

प्रेम-बाटिका के दोऊ, माली-मालिन-द्वन्द्र ।।

मोहन छबि रसखानि लखि अब दृग अपने नाहि।

अँचे आवत धनुस से छूटे सर से जाहि।

मो मन मानिक लै गयो चितै चोर नंदनंद।

अब बेमन मैं का करूँ परी फेर के फंद।

प्रीतम नन्दकिशोर, जा दिन तै नैननि लग्यौ।

मन पावन चितचोर, पलक ओट नहिं करि सकौं ।।


(पृष्ठ 115)


शब्दार्थ अयनि (सं. स्त्री.) गृह, खजाना। प्रेम-बरन प्रेम-रूप। नंदनंद = नंदपुत्र-कृष्ण। प्रेम-वाटिका (सं. स्वी०) प्रेम रूपी बाग। दोऊ (वि.) = दोनों। द्वन्द्व = दोनों एक समान । मोहन (पुं०) = कृष्ण, सुंदर। छवि (सं. स्त्री) = रूप। (क्रि०) = देखकर । दृश (पुं.) = नयन। आवत (क्रि.) = आता है। अँचे क्षण भर के लिए। धनुष (पुं०) = धनुष । छूटे (क्रि.) = छूटता है। सर = बाण। मो (सर्व) = मेरा। चितै (पुं०) चित्त, हृदय । बेमन (पुं.) = अनिच्छा। परी (क्रि०) = पड़ गया। फंद (पुं०) फंदा में। प्रीतम (वि.) प्रेमी, प्यारे। जा दिन = जिस दिन से। ते से। नैननि (पुं०) आँख में। लग्यौ (क्रि.)= बस गया। पावन (वि.) = पवित्र। पलक (स्त्री.) आँख की पलकें। ओट = छिपना ।


सरलार्थ-रसखान कवि कहते हैं कि राधा प्रेम स्वरूपा हैं तो श्रीकृष्ण प्रेमरूप हैं। ये दोनों प्रेम रूपी वाटिका के माली-मालिन के समान हैं। कवि ने जबसे इन दोनों को देखा है, उनकी आँखें उन्हीं दोनों को देखती रहती हैं। क्षण भर के लिए आते हैं और जैसे धनुष से बाण छूटता है, उसी प्रकार आते-जाते रहते हैं। अर्थात् प्रेम रूपी वाण से वह इस प्रकार विंध जाता है कि उसे अपना कोई ख्याल नहीं रह जाता है। श्रीकृष्ण ने उसके मन को चुरा लिया है जिस कारण मन (इच्छा) रहित हो गए हैं। वह इस प्रेम के जाल में बुरी तरह फँस गए हैं। रसखान अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहते हैं कि जिस दिन से उनके दर्शन हुए है, उसने उनका मन चुरा लिया है। फलतः हर क्षण कृष्ण एवं राधा के रूप सौन्दर्य को अपलक देखते रहते हैं।


(ख) करील के कुंजन ऊपर वारौं


या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर की तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि नवोनिधि को सुख नन्द की गाइ चराई बिसारौं ।। रसखानि कबौं इन ऑखिन सौ बज के बनबाग तड़ाग निहारौं।कोटिक रौ कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारी।

(पृष्ठ 115)

शब्दार्थ-या (संबंध) = इस। लकुटी (सं. स्त्री.) लाठी, गाय चराने का डंडा। अरु = और । कामरिया (सं. स्त्री) कंबल। राज (सं. पुं.) राज्य, शासन। तिहूँ (वि.) = तीनों। पुर (सं पुं०) = नगर, गाँव। तजि डारौं (क्रि.) त्याग दूँ। आठहुँ सिद्धि (वि.) = आठों प्रकार की सिद्धियों (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्रापित, प्राकाम्य, ईशित्व तथा विशित्व)। नवोनिधि नौ प्रकार की निधियाँ (पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नाल एवं खर्व। चराई (क्रि.) = चराकर। बिसारौं (क्रि.) = भूल जाऊँ। कबी (अव) = कब । सौं = से। बनबाग (सं. पुं०) फुलवारी, जंगल। तड़ाग (पुं०) = तालाब । निहारौं (क्रि.) = देखूँ। कोटिक (वि.) = करोड़ों। कलधौत' (सं. पुं.) = सोना। धाम (सं. पुं.) = भवन । करील (स्त्री.) = काँटेदार झाड़ी। कुंजन (वि.) लता समूह। वारों (क्रि.) = अर्पण कर दूँ।


सरलार्थ-कवि रसखान अपनी हार्दिक अभिलाषा प्रकट करते हुए कहते हैं कि श्रीकृष्ण की लाठी एवं कंबल पर तीनों लोक के राज्य का त्याग कर दूँ। नंद बाबा की गाय चराने का अवसर मिल जाए तो आठों प्रकार की सिद्धियों तथा नव-निधियों के सुखों का त्याग करने में मुझे कष्ट महसूस नहीं होगा। कवि का कहना है कि जबसे बज के वनों, निकुंजों, तालाबों तथा करील के सघन कुँजों को अपनी आँखो से देखा हूँ, तब से इच्छा होती है कि ऐसे मनोहर निकुंजों की सुन्दरता के समक्ष करोड़ों सुनहरे महल तुच्छ प्रतीत होते हैं अर्थात् ऐसे मूल्यवान महलो को छोड़कर जहाँ कृष्ण रासलीला करते थे, वहीं निवास करूँ ।

बोध और अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर


कविता के साथ :


प्रश्न 1. कवि ने माली-मालिन किन्हें और क्यों कहा है?


उत्तर-कवि ने राधा-कृष्ण को माली-मालिन इसलिए कहा है क्योंकि ये दोनों प्रेम-वाटिका के युगल रूप हैं। इन्हीं दोनों के आपसी संयोग से कवि का रसिक हृदय प्रेम-रस से अभिसिक्त होता है, जैसे माली-मालिन के संयोग से वाटिका शोभा पाती है, वैसे ही प्रेम-स्वरूप राधा एवं प्रेम-रूप कृष्ण के युगल रूप से कवि का प्रेम पुष्ट होता है।


प्रश्न 2. द्वितीय दोहे का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट करें।


उत्तर-प्रस्तुत दोहे में कृष्ण के अपूर्व रूप-लावण्य का वर्णन है। श्रीकृष्ण के ऐसे मनोहर रूप को देखकर कवि इस प्रकार आकृष्ट होता है कि उसे अपने-आपकी सुध नहीं रहती। उसका मन कृष्ण के मोहक रूप पर अटक जाता है, जैसे धनुष पर चढ़ाया वाण खींचे जाने पर वाण छूटता है। तात्पर्य यह कि श्रीकृष्ण का अलौकिक सौन्दर्य देखते ही उसकी आँखें हर क्षण उसी सौन्दर्य को देखते रहना चाहती है, जिस कारण आँख पर उसका कोई अधिकार नहीं रह गया है। अर्थात् कवि का हृदय उनके सौन्दर्य रूपी वाण से बंध गया है। प्रस्तुत पद की भाषा बजभाषा तथा दोहा छंद है। उपमा अलंकार है क्योंकि कृष्ण के सौन्दर्य की तुलना वाण से की गई है। भक्ति रस की ओट में शांत रस की अभिव्यंजना है।


प्रश्न 3. कृष्ण को चोर क्यों कहा गया है ? कवि का अभिप्राय स्पष्ट करें।


उत्तर-कवि ने कृष्ण को चोर, इसलिए कहा है, क्योंकि जिस प्रकार चोर कोई सामान चुराकर ले जाता है तो सामान वाला उस वस्तु से वंचित हो जाता है, उसी प्रकार कृष्ण का अलौकिक सौन्दर्य कवि के मन को चुरा लिया है अर्थात् आकृष्ट कर लिया है। फलतः उसका मन उनके अधीन नहीं रहता। कवि के ऐसा कहने का अभिप्राय है कि उसका मन कृष्ण के सौन्दर्य से इतना आसक्त है कि वह बेमन हो गया है। कवि को कृष्ण के सिवा और कुछ दिखाई ही नहीं देता। वह कृष्ण के प्रेम रस में पूर्णतः डूब गया है। अतः इस दोहे में कृष्ण के प्रति कवि की अनन्य भक्ति प्रकट होती है।


प्रश्न 4. सवैये में कवि की कैसी आकांक्षा प्रकट होती है ? भावार्थ बताते हुए स्पष्ट करें।


उत्तर- प्रस्तुत सवैये में कृष्ण एवं ब्रज के प्रति कवि का पूर्ण समर्पण प्रकट होता है। कवि की उत्कट आकांक्षा है कि वह किसी भी रूप में बज में ही निवास करे। वह संसार के हर सुख का त्याग कर सकता है, लेकिन कृष्ण तथा ब्रज का त्याग सर्वथा असंभव है। तात्पर्य यह कि कवि रसखान कृष्ण प्रेम में इतना रम गये थे कि उन्हें कोई भी सुख अच्छा नहीं लगता था। इसीलिए कवि अपनी हार्दिक इच्छा प्रकट करता है कि यदि कृष्ण की लाठी तथा कंबल मिल जाए तो वह तीनों लोकों के राज सुख का हँसते हुए त्याग कर देगा। क्योंकि इस बहाने उसे कृष्ण का स्पर्श-सुख मिल जाएगा। इसी प्रकार कवि आठों सिद्धि एवं नौ निधियों जैसे दुर्लभ सुख को नंद की गाय चराते हुए बिसार देने की इच्छा जाहिर करता है। इतना ही नही, सोने के चमचमाते महल में रहने की अपेक्षा वृन्दावन के निकुंजों में रहना बेहतर मानता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्तुत सवैये में कृष्ण एवं बज के प्रति कवि ने अपना अनन्य प्रेम प्रकट करते हुए यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि भक्ति भाव प्रधान होती है, जिस कारण इष्ट की हर वस्तु में एक समान आनन्द की अनुभूति होती है।


प्रश्न 5. व्याख्या करें:

(क) मन पावन चितचोर पलक ओट नहीं करि सकौं।

(ख) रसखानि कबौं इन आखिन सौं ब्रज के बनबाग तड़ाग निहारौं।


उत्तर- (क) प्रस्तुत पंक्ति कवि रसखान लिखित दोहे सोरठा से उद्धृत है। इसमें कवि ने राधा-कृष्ण के रूप-सौंदर्य की विशेषता पर प्रकाश डाला है। कवि का कहना है कि उसके हृदय में दोनों युगल रूप इस प्रकार स्थापित हो गये हैं कि अहर्निश उन्हें देखते रहना चाहते हैं। तात्पर्य यह कि कवि राधा-कृष्ण के प्रेममय रूप पर इतना लुब्ध हो गया है कि उसकी आँखें हर क्षण एकटक उसी रूप को देखती रहती है। अर्थात् राधा-कृष्ण के अलौकिक रूप ने उसके मन को चुरा लिया है। अतः इसमें कृष्ण के प्रति कविं के प्रेम की अभिव्यंजना है।


(ख) प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से कवि रसखान ने अपनी विवशता प्रकट की है। कवि का कहना है कि वह कृष्ण के अलौकिक रूप से इतना अभिभूत हो गया है कि उसका मन अब उसके अधीन नहीं है। इस विवशता के कारण वह अन्य किसी से प्रेम नहीं कर सकता। उसका मन तो राधा-कृष्ण के प्रेम जाल में बुरी तरह फैसा हुआ है। अतः कवि अपनी लाचारी प्रकट करते हुए यह स्पष्ट करना चाहता है कि जब कोई व्यक्ति सच्चे दिल से किसी पर समर्पित हो जाता है, तब वह उस पर आश्रित हो जाता है। इस आश्रय के कारण व्यक्ति का अपना कुछ शेष रह नहीं जाता। इसीलिए कवि भी इस प्रेम के कारण स्वयं को लाचार या विवश महसूस करता

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें