सोमवार, 26 मई 2025

Class 10 विष के दाँत ( नलिन विलोचन शर्मा)h ( नलिन विलोचन शर्मा)

 2. विष के दाँत ( नलिन विलोचन शर्मा)


लेखक-परिचय-हिन्दी कविता में प्रपद्यवाद के प्रवर्तक तथा नई शैली के आलोचक नलिन विलोचन शर्मा का जन्म पटना के बदरघाट (भद्रघाट) में 1916 ई. में हुआ था। वे प्रख्यात विद्वान पं. रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। माता का नाम रत्नावती शर्मा था। इनके व्यक्तित्व-निर्माण में पिता की अहम भूमिका रही है। उन्होंने स्कूल की पढ़ाई पटना कॉलेजिएट से पूरी की तथा संस्कृत और हिन्दी में एम. ए. पटना विश्वविद्यालय से किया। अध्ययन समाप्ति के बाद उन्होंने अध्यापन कार्य राँची विश्वविद्यालय तथा फ्टना विश्वविद्यालय में किया। इनकी मृत्यु 1961 ई. में हुई।


रचनाएँ नलिन जी की मुख्य रचनाएँ है- 'दृष्टिकोण', 'साहित्य का इतिहास दर्शन', 'मानदंड', 'हिन्दी उपन्यास विशेषतः प्रेमचन्द', 'साहित्य तत्व और आलोचना', 'विष के दाँत', सत्रह असंगृहीत पूर्व छोटी कहानियाँ, 'नकेन के प्रपद्या' 'नकेन-दो' तथा 'संत परंपरा और साहित्य' ।


साहित्यिक-विशेषताएँ- हिन्दी के अजेय स्तम्भ नलिन विलोचन शर्मा से ही प्रयोगवादी कविता का आरंभ हुआ। इनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिकता के तत्व समग्र रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इन्होंने आलोचना में आधुनिक शैली का समर्थन किया है। वे कथ्य, शिल्प, भाषा आदि सभी स्तरों पर नवीनता के आग्रही लेखक थे। उनमें प्रायः पंरपरागत शैली का निषेध तथा आधुनिक दृष्टि का समर्थन है। इनकी भाषा संकेतात्मक तथा सुगठित है। इन्होंने अनेक पुराने शब्दों को नया जीवन दिया, जो आधुनिक साहित्य में फिर से प्रतिष्ठित हुए।


पाठ-परिचय-प्रस्तुत कहानी 'विष के दाँत' अन्य कहानियों नामक कहानी संग्रह से संकलित है। इसमें मध्यवर्गीय अन्तर्विरोधों को उजागर किया गया है। कहानी का जैसा दोस सामाजिक संदर्भ है, वैसा ही स्पष्ट मनोवैज्ञानिक आशय भी है। आर्थिक कारणों से मध्यवर्ग के भीतर ही एक ओर सेन साहब जैसे महत्वाकांक्षी तथा सफेदपोशी अपने भीतर लिंग-भेद जैसे कुसंस्कार छिपाए हुए हैं तो दूसरी ओर गिरधर जैसे नौकरीपेशा निम्न मध्यवर्गीय है जो अनेक तरह की थोपी गई बंदिशों के बीच भी अपने अस्तित्व को बहादुरी एवं साहस के साथ बचाए रखने के लिए संघर्षरत है।

यह. कहानी सामाजिक भेदभाव, लिंग-भेद, आक्रामक स्वार्थ की छाया में पलते हुए प्यार-दुलार के कुपरिणामों को उभारती हुई सामाजिक समानता एवं मानवाधिकार की महत्त्वपूर्ण बानगी पेश करती है। 

मुहावरे


1.विष के दाँत दुष्ट की दुष्टता) राजू की दुष्टता का दंड यही है कि उसके विप के दाँत तोड़ दिए जायें।

2.किलकारी मारना (खुशी प्रकट करना) माता को देखकर बच्चा किलकारी मारने लगा।

3.आँखों का तारा (बहुत प्यारा) मोहन अपने बाप की आँखों का तारा है।

4.आविर्भाव होना (जन्म लेना) मुगलशासन काल में हुआ था। महान कवि संत तुलसीदास का अविर्भाव

5.नियमों का अपवाद होना (अलग ढंग का होना) बाप की ढिलाई के कारण रमेश अपने घर के नियमों का अपवाद है।

6.ऐंठकर रह जाना (चुपचाप सहन कर लेना) सेन साहब पत्रकार के व्यंग्यात्मक उत्तर सुनकर ऐंठकर रह गए।

7.तितर-बितर होना (बिखर जाना) पुलिस के पहुँचते ही भीड़ तितर-बितर हो गई।


बोध और अभ्यास प्रश्न और उनके उत्तर


पाठ के साथ :


प्रश्न 1. कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर कहानी का शीर्षक 'विष के दाँत' इसलिए भी उपयुक्त है, क्योंकि इसी विष के दाँत अर्थात् काशू के जन्म लेते ही सेन-पुत्रियाँ उपेक्षित हो जाती हैं, मदन मार खाता है तथा गिरधर को नौकरी से हटा दिया जाता है।

प्रश्न 2. सेन साहब के परिवार में बच्चों के पालन-पोषण में किए जा रहे लिंग आधारित भेद-भाव का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर-सेन साहब के परिवार में लड़कियों तथा लड़के के पालन-पोषण के अलग-अलग नियम थे। पाँचों लड़कियों के लिए अलग नियम थे, दूसरी तरह की शिक्षा थी और खोखा (पुत्र) के लिए अलग, क्योंकि वह नाउम्मीद बुढ़ापे की आँखों का तारा था। लड़कियों को अलग ढंग की तालीम सिखाई गई थी। उनके खेलने-कूदने तथा बोलने पर पाबंदी थी। वे बिना आदेश के घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं। वे घर में कठपुतलियों की तरह थीं, जबकि खोखा बुढ़ापे की संतान होने के कारण जीवन के नियम का अपवाद होने के साथ-साथ घर के नियमों का भी अपवाद था। उस पर किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं थी। उसकी हरकत पर सेनसाहव का कहना था कि 'उसे तो इंजीनियर होना है, इसलिए वह अभी से कुछ-न-कुछ जानकारी लेना चाहता है।' घर में लिंग भेद ऐसा ही था कि शरारती खोखे की प्रशंसा की जाती थी किंतु तहजीव एवं तमीज की मूर्ति पुत्रियों की चर्चा तक नहीं होती थी।


प्रश्न 3. खोखा किन मामलों में अपवाद था?


उत्तर-रोन साहब को पाँच पुत्रियों थी। पुत्र का आविर्भाव तब हुआ जब संतान की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई थी। अर्थात् सेन साहब की पुत्र तब नसीब हुआ जब पति-पत्नी दोनों बुढ़ापे के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके थे। इसलिए, खीखा जीवन के नियमों के अपवाद के साथ-साथ घर के नियमों का भी अपवाद था।


प्रश्न 4. सेन दंपती खोखा में कैसी संभावनाएँ देखते थे और उन संभावनाओं के लिए उन्होंने उसकी कैसी शिक्षा की व्यवस्था की थी?


उत्तर-सेन दंपत्ति खोखा में इंजीनियर बनने की संभावनाएँ देखते थे, क्योंकि वह आखिर उनका बेटा जो था। उसे इंजीनियर बनाने के लिए वैसी ही ट्रेनिंग दी जा रही थी। वे उसे अपने ढंग से ट्रेंड कर रहे थे। उसकी शिक्षा की व्यवस्था यह की गई थी कि कोई कारखाने का बढ़ई मिस्त्री दो-एक घंटे आकर उसके साथ ठीक-पीठ किया करे, ताकि उसकी उँगलियाँ अभी से औजारों से वाकिफ हो जायें।


प्रश्न 5. सप्प्रसंग व्याख्या कीजिए :


(क) लड़‌कियाँ क्या हैं, कठपुतलियों हैं और उनके माता-पिता को इस बात का गर्व है। (पृष्ठ 7)


व्याख्या-प्रस्तुत गद्यांश महान् साहित्यकार नलिन विलोचन शर्मा द्वारा लिख्ति कहानी 'विष के दाँत' से उद्धृत है। इसमें लेखक ने सेन साहब की पुत्रियों की विशेषताओ और विवशताओं पर प्रकाश डाला है।


सेन दंपत्ति को पाँच लड़कियाँ है सीमा, रजनी, आली, शेफाली तथा आरती। सभी लड़कियाँ सभ्य तथा शिष्ट हैं। उन्हें अपने माता-पिता से सभ्यता एवं शिष्टता की शिक्षा दी गई हो अथवा नहीं, लेकिन क्या-क्या नहीं करना चाहिए, इसकी उन्हें ऐसी तालीम दी गई है कि लोग देखते ही दंग रह जाते हैं। वे शाम के वक्त दौड़ती-खेलती है लेकिन किसी चीज को तोड़ती-फोड़ती नहीं। इतना ही नहीं, वे खिलखिलाकर हँसती भी नहीं, उनके होठों की मुस्कुराहट ऐसी होती है कि सोसाइटी की तारिकाएँ भी सीखने को व्यग्र हो जायें।


लेखक के कहने का भाव है कि लड़कियाँ इतनी शालीन है कि सेन दंपत्ती गौरवान्वित है। उनके यहाँ आने-जाने वाले लोग अपने बच्चों की शरारत पर खीड़ा कर कहते-तुम लोग फूल का गमला तोड़ने के लिए बने हो और सेन-पुत्रियों की सज्जनता की प्रशंसा करने लगते ।


(ख) खोखा के दुर्ललित स्वभाव के अनुसार ही सेन साहब ने सिद्धांतों को भी बदल लिया था।


(पृष्ठ 8)


व्याख्या-प्रस्तुत संदर्भ महान् आलोचक एवं साहित्यकार नलिन विलोचन शर्मा विरचित कहानी 'विष के दाँत' पाठ से लिया गया है। इसमें लेखक ने सेन दंपत्ती की लिंग-भेद संबंधी भेदभावपूर्ण नीति पर प्रकाश डाला है।

लेखक का कहना है कि सेन दंपत्ति अपनी पुत्रियों के लिए घर में अलग नियम बनाए हुए थे। उनकी शिक्षा भी भिन्न थी। लड़कियों को सभ्यता एवं शिष्टत्ता की शिक्षा दी गई थी। उनके लिए नियमों का पालन करना आवश्यक था। सेन दंपत्ती अपने को अनुशासन प्रिय मानते थे, किन्तु बुढ़ापे के अंतिम पड़ाव में जब पुत्र ने जन्म लिया तो उनका सिद्धांत बदल गया, क्योकि वह बेटा था। उसकी हरकत का प्रतिरोध के बदले समर्थन होने लगता था। लेखक ने सेन दंपत्ति की दूषित मानसिकता के माध्यम से यह स्पष्ट करना चाहा है कि दोषपूर्ण सामाजिक परंपरा तथा पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था के कारण पुत्र को विशेष महत्त्व दिया जाता है, चाहे वह कुपुत्र ही क्यों न हो, जबकि सर्वगुण सम्पन्न लड़कियों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसका कारण यह है कि पुत्रहीन पिता को बुढ़ापे के द्वार पहुँचने के समय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है।


(ग) ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुंडे, चोर और डाकू बनते हैं। (8)


संकेत : पृष्ठ 20 पर व्याख्या संख्या-3 देखें।


(घ) हंस कौओं की जमात में शामिल होने के लिए ललक गया। (पृ. 10)


उत्तर- प्रस्तुत पंक्ति कहानीकार नलिन विलोचन शर्मा लिखित कहानी 'विष के दाँत' शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसमें लेखक ने खोखा के बाल-स्वभाव का वर्णन किया है।


लेखक का कहना है कि बच्चों में मान-सम्मान की भावना नहीं होती। वे खेलप्रिय होते हैं। इसी खेलप्रियता के कारण खोखा उन आवारागर्द छोकरों के पास पहुँच जाता है, जहाँ मदन के साथ अन्य बच्चे बंगले के अहाते की बगलवाली गली में धूल में खेल रहे थे। उन आवारागर्द बच्चों को लट्टू नचाते देखकर खोखा भी खेलने के लिए ललच उठता है। आदत से लाचार वह बड़े रोब के साथ मदन से लट्‌टू माँगता है, लेकिन एक दिन पूर्व उसके द्वारा अपमानित एवं प्रताड़ित किया गया मदन लट्टू देने से इनकार कर देता है तथा अपने पिता की गाड़ी के साथ खेलने के लिए कहता है। अतः यहाँ लेखक ने यह साबित करना चाहा है कि गरीब हो या अमीर, सारे बच्चे समान स्वभाव के होते हैं। उनके लिए गरीब-अमीर में कोई अंतर नहीं होता। वे आदत से मजबूर होते हैं। इसीलिए वह वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ उनकी इच्छा की पूर्ति होती है। इसका प्रमाण है कि हंस (खोखा) कौओं (गरीब के बच्चे) की जमात में शामिल होने के लिए ललक रहा है।


प्रश्न 6. सेन साहब और उनके मित्रों के बीच क्या बातचीत हुई और पत्रकार मित्र ने उन्हें किस तरह उत्तर दिया ।


उत्तर-सेन साहब और ड्राइंग रूम में बैठे उनके मित्रों के बीच बातचीत हुई कि वह अपने पुत्र को अपने ढंग से ट्रेड करेंगे, क्योंकि वह उसे अपनी तरह बिजनेस-मैन या इंजीनियर बनाना चाहते हैं। वहाँ बैठे पत्रकार महोदय से जब उनके बच्चे के विषय में उनका ख्याल पूछा गया, तब उन्होंने उत्तर दिया कि उनका पुत्र जेटिलमेन जरूर बने और जो कुछ बने या न बने, उसका काम है, उसे पूरी आजादी रहेगी। पत्रकार महोदय ने उन्हें शिष्टतापूर्ण, किन्तु व्यंग्यात्मक ढंग से उत्तर दिया।

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