Bihar Board Class 10 Hindi Solutions पद्म Chapter 1 राम बिनु बिरथे जगि जनमा
प्रश्न 1.कवि किसके बिना जगत् में
यह जन्म व्यर्थ मानता है?
उत्तर-कवि राम-नाम के
बिना जगत में यह जन्म व्यर्थ मानता है। राम-नाम के बिना व्यतीत होने वाला जीवन
केवल विष का भोग करता है।
प्रश्न 2 वाणी कब विष के समान हो
जाती है?
उत्तर- जब वाणी वाह्य आडंबर से
सम्पन्न होकर राम नाम को त्याग देती है तब वह विष हो जाती है। राम-नाम के अतिरिक्त
उच्चरित ध्वनि काम-क्रोध, मद सेवन आदि से परिपूर्ण होती है।
प्रश्न 3. नाम-कीर्तन के आगे कवि
किन कर्मों की व्यर्थता सिद्ध करता है?
उत्तर-पुस्तक पाठ, व्याकरण के ज्ञान की बखान, दंड कमण्डल धारण करना, सिखा बढ़ाना, तीर्थ भ्रमण, जटा बढ़ाना, तन में भस्म लगाना, वस्तहीन होकर नग्न रूप
में घूमना इत्यादि कर्म ईश्वर प्राप्ति के साधन माने जाते हैं। लेकिन कवि कहते हैं
क…
प्र 5. हरिस्स से कवि का
अभिप्राय क्या है?
उत्तर-कवि राम नाम की
महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि भगवान के नाम से बढ़कर अन्य कोई धर्म साधना
नहीं है। भगवत् कीर्तन से प्राप्त परमानंद को हरि रस कहा गया है। भगवान् के नाम
कीर्तन, नाम स्मरण
में डूब जाना, हरि कीर्तन
में रम जाना और कीर्तन में उत्साह, परमानंद की अनुभूति करना ही हरि रस है। इसी रस पान से जीव धन्य हो सकता है।
प्रश्न 6.कवि की दृष्टि में ब्रह्म
का निवास कहाँ है?
उत्तर-जो प्राणी सांसारिक
विषयों की आसक्ति से रहित है, जो मान-अपमान से परे हे, हर्ष-शोक दोनों से जो दूर है, उन प्राणियों में ही ब्रह्म का निवास बताया गया है। काम, क्रोध, लोभ, मोह जिसे नहीं छूते वेसे
प्राणियों में निश्चित ही ब्रह्म का निवास है।
प्रश्न 7. गुरु की कृष्ण से किस
युक्ति की पहचान हो पाती है ?
उत्तर- कवि कहते हैं कि ब्रह्म
से साक्षात्कार करने हेतु लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा आदि से दूर होना
आवश्यक है। ब्रह्म के सानिध्य प्राप्ति के लिए सांसारिक विषयों से रहित होना
अत्यन्त जरूरी है। जो प्राणी माया, मोह, काम, क्रोध लोभ, हर्ष-शोक से रहित ते
उसमें ब्रह्म का अंश विद्यमान हो जाता है। वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
ब्रह्म प्राप्ति की यही युक्ति की पहचान गुरु कृपा से ही हो पाती है। गुरु बिना
ब्रह्म को पाने की युक्ति का ज्ञान नहीं मिल सकता। अर्थात् ब्रह्म को पाने के लिए
गुरु का कृपा पात्र होना परमावश्यक है।
प्रश्न 8. व्याख्या करें
(क) राम नाम
बिनु अरुझि मरे ।
(ख) कंचन माटी
जाने ।
(ग) हरष सोक
ते रहे नियारो, नाहि मान
अपमाना।
(घ) नानक तीन
भयो गोविंद सो, ज्यों पानी
संग पानी।
उत्तर-
(क)
प्रस्तुत
पद्मांश हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी साहित्य के महान संत कवि गुरुनानक के द्वारा
लिखित 'राम नाम बिनु
निर्गुण जग जनमा" शीर्षक से उद्धृत है। गुरुनानक निर्गुण निराकार ईश्वर के
उपासक तथा हिंदी की निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि है। यहाँ राम नाम की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं।
(ख)
प्रस्तुत
व्याख्येय पंक्ति में कवि ब्रह्म को पाने के लिए सुख-दुःख से परे होना परमावश्यक
बताते हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्म को वहीं प्राप्त कर सकता है जो लोक मोह
ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध से
परे हो। जो व्यक्ति सोना को अर्थात् धन को मिट्टी के समान समझकर परब्रह्म की सच्चे
हृदय से उपासना करता है वह ब्रह्ममय हो जाता है। जो प्राणि सांसारिक विषयों में
आसक्ति नहीं रखता है। उस प्राणि में ब्रह्म निवास करता है।
(ग)
प्रस्तुत
पंक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक हिंदी साहित्य के संत कवि गुरुनानक द्वारा रचित 'जो नर दःख में दःख नहीं
माने शीर्षक से उद्धृत है। प्रस्तुत पंक्ति में संत गुरुनानक उपदेश देते हैं कि
ब्रहा के उपासक प्राणि को हर्ष-शोक, सुख-दुख, निदा प्रशंसा, मान-अपमान से परे होना
चाहिए। इन संबके पृथक रहने वाले प्राणियों में ब्रह्म का निवास स्थान होता है।प्रस्तुत
पंक्ति में कवि कहते हैं ब्रह्म निर्गुण एवं निराकार है। वैराग्य भाव रखकर ही हम
उसे पा सकते हैं। झूठी मान्, बड़ाई या निदा शिकायत की उलझन मनुष्य को ब्रह्म से दूर ले जाता है। ब्रह्म को
पाने के लिए, सच्ची मुक्ति
के लिए हर्ष-शोक, मान अपमान से
दूर रहकर, उदासीन रहते
हुए ब्रह्म की उपासना करना बाहिए।
(घ)
प्रस्तुत प
हमार्य पाठ्य पुस्तक हिंदी साहित्य के महान संत कवि गुरुनानक के द्वारा रचित 'जो नर दुःखं में दःख नहीं
माने" पाठ से उद्धृत है। इसमें कवि ब्रह्म की सत्ता की महत्ता को बताते हैं।
मनुष्य जन्म का अंतिम लक्ष्य ब्रह्म को पाना बताते हुए कहते हैं कि सांसारिक
व्यक्ति से दूर रहकर मनुष्य को ब्रह्ममय होने की साधना करनी चाहिए। गुरु कृपा से
ईश्वर की प्राप्ति । संभव है। प्रस्तुत व्याख्येय पंक्ति के माध्यम से कवि कहना चाहते हैं। इस मानवीय जीवन
में ब्रह्म को पानी की सच्ची युक्ति, यथार्थ उपाय करना आवश्यक है। पर ब्रह्म को पाना प्राणि का अंतिम लक्ष्य होना
चाहिए। जिस प्रकार पानी के साथ पानी मिलकर एकसमान हो जाता है उसी प्रकार जीव जब
ब्रह्मा के सानिध्य में जाता है तब ब्रह्ममय हो जाता है। जीवात्मा एवं परमात्मा
में जब मिलन होता है तब जीवात्मा भी परमात्मा बन जाता है। दोनों का भेद मिट जाता
है। कवि कहते हैं कि यह जीव ब्रह्म का ही अंश है। जब हम विषयों की आसक्ति से दूर
रहकर गुरु की प्रेरणा से ब्रह्म को पाने की साधना करते हैं तब ब्रह्म का
साक्षात्कार होता है और ऐसा होने से जीव ब्रह्ममय हो जाता है।
प्रश्न 9.
आधुनिक जीवन में उपासना
के प्रचलित रूपों को देखते हुए नानक के इन पदों की क्या प्रासंगिकता है? अपने शब्दों में विचार
करें।
उत्तर-
आधुनिक जीवन में उपासना
के विभिन्न स्वरूप दिखाई पड़ते हैं। ईश्वरीय उपासना में लोग तीर्थाटन करते हैं.
जटा-बढ़ाकर, भस्म रमाकर
साधु वेश धारण करते हैं। गंगा खान दान पुण्य करते हैं। मंदिर मस्जिद जाकर परमात्मा
की पुकार करते है। साथ ही आज धर्म के नाम पर विभेद भी किया जाता है। धर्म को
प्रतिष्ठा प्राप्ति के साधन मानकर धार्मिक बाह्याडम्बर अपनाया जा रहा है।
बड़े-बड़े धार्मिक आयोजन किये जाते हैं जिसमें अत्यधिक धन का व्यय भी किया जाता
है। फिर भी लोगों को सुख-शांति नहीं मिलती है। आज लोग भटकाव के पथ पर अग्रसर है।
समयाभाव में ईश्वर के सानिध्य में जाने हेतु कठिनतम उपासना के मार्ग को अपनाने में
तमे अभिरुचि नहीं रख रहे हैं। इसलिए धार्मिक क्षेत्र में भटकाव आ गया है। हम कह
सकते है कि नानक के पद में वर्णित राम नाम की महिमा आधुनिक जीवन में सप्रासंगिक
है। हरि-कीर्तन सरल मार्ग है जिसमें न अत्यधिक धन की आवश्यकता है नहीं कोई
बाह्याडम्बर की। आज भगवत् नाम रूपी रस का पान किया जाये तो जीवन में उल्लास, शांति, परमानन्द सुख ईश्वरीय
अनुभूति को प्राप्त किया जा सकता है। हरि रस पान से जीवन को धन्य बनाया जा सकता
है। नानक के उपदेश को अपनाकर पधार्थ से मुक्त होकर हम जीवन में ब्रह्म का
साक्षात्कार आज भी कर सकते हैं।
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