बुधवार, 26 नवंबर 2025

class 10 ch 4 नाखून क्यों बढ़ते हैं? - हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रश्नोत्तर

 नाखून क्यों बढ़ते हैं? - हजारी प्रसाद द्विवेदी प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ?
उत्तर 

नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे लेखक की छोटी पुत्री ने उपस्थित किया।

प्रश्न 2. बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है ?
उत्तर

बढ़ते नाखूनों द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाता है कि मनुष्य कभी | लाख वर्ष पूर्व नख-दन्तावलंबी था। पशुत्व भाव को प्राप्त किये थी। नखों के द्वारा में ही प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ता था। नख कट जाने पर उसको डाँट पड़ता होगा इत्यादि।

प्रश्न 3. लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप देखना कहाँ तक संगत है ?
उत्तर

नाखून ही मानव के अस्त्र थे। आज से लाख वर्ष पूर्व जब जंगल में रहता था। अपने पैने नुकीले नख से अन्य जीवों को आहट कर पेट भरता था। अपने नाखन के प्रहार से प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ता था। इसलिए नाखूनों को अस्त्र के रूप । में देखना युक्तिसंगत है।

प्रश्न 4. मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है ?
उत्तर

नाखून मनुष्य का प्राचीनतम होथयार है। जिस समय मनुष्य पश की भाँति जीवन व्यतीत कर रहा था। आज मनुष्य उस पाशविक वृत्ति को छोड़ चका है। मानविक गुण आ जाने के कारण पशुता का त्याग करना ही उचित मानता है। इसलिए मनुष्य नाखून को अपना हथियार नहीं बनाना चाहता है। नाखून बढते हैं इसका बढ़ना मनुष्य के शरीर को सहज वृति है।
वह बार-बार बढ़ेगा। लेकिन मानव पशुता की ओर अधोगामिनी वृति नहीं अपनायेगा। उसे बार-बार काटता है और काटता रहेगा।

प्रश्न 5. नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?
उत्तर

मानव शरीर में कुछ सहजवृत्तियाँ होती रहती हैं। जैसे नाखून का बढ़ना, केश का बढ़ना आदि उसी प्रकार नाखून को बढ़ाना और उन्हें काटना भी मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं। इसका अभिप्राय यह है कि नाखून को बढ़ाना पशुत्व का प्रमाण और उसका काटना मानत्व का प्रमाण है। वह बढ़ता रहेगा लेकिन हम उसे काटकर पशुत्व का त्याग और मनुष्यता को ग्रहण करते रहें, क्योंकि पशु बनकर कोई आगे नहीं बढ़ सकता है।

प्रश्न 6. लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें।
उत्तर

लेखक पूछता है। माना मेरी छोटी निर्बोध बालिका ने मनुष्य जाति से पूछ रही है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर। मनुष्य का अस्त्र-शस्त्र बढ़ना क्या पशुता की ओर नहीं ले जा रहा है। क्या मनुष्य अस्त्र काटने की ओर बढ़ रहा है? जवाब मिलेगा नहीं। फिर मनुष्य का मानत्व बढ़ना तो है ही नहीं। अर्थात् आज का मनुष्य अस्त्र-शस्त्र को बढ़ाकर पशु की ओर ही अधोगामिनी गति को प्राप्त कर रहा है।

प्रश्न 7. देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक के निष्कर्ष क्या हैं ?
उत्तर

देश की आजादी के लिए प्रयुक्त इण्डिपेण्डेन्स" स्वाधीनता दिवस शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक का निष्कर्ष है कि 'इण्डिपेण्डेन्स' का अर्थ अन् अधीनता अर्थात् अधीनता का अभाव होता है लेकिन हम भारतीयों ने उसको सहज भाव में "स्वाधीनता" नाम दे दिया। यह हमारी विशेषता है कि हम 'अन्' को "स्व" में बदल डाला। जबकि स्वाधीनता के लिए अंग्रेजी शब्द "सेल्फ डिपेण्डेन्स" शब्द का प्रयोग होना चाहिए था।

प्रश्न 8. “स्वाधीनता' शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है ?
उत्तर

लेखक ने "स्वाधीनता" शब्द की सार्थकता बताते हुए कहते हैं कि अनधीनता" (इण्डिपेण्डेन्स) को भारत के लोग "स्वाधीनता" के रूप में सोच लिया यह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। इसीलिए हम "स्व" के बंधन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

प्रश्न 9. मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे।प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है?
उत्तर

प्राणिशास्त्रियों का अनुमान है कि मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएँगे। इस अनुमान से लेखक के मन में आशा जगती है कि समय पाकर मानव के पूंछ झड़ गये। मानव में मानत्व के गुण आने लगे। पाशविक विकार दूर हुए। ठीक उसी प्रकार पशुता के प्रतीक यह बढ़ने वाला नाखून भी जब झड़ जाएँगे तब मानव में शेष पाशविक वृति भी समाप्त हो जायेगी और मनुष्य में मानविक वृति का संचार होने लगेगा।

प्रश्न 10. लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर 

लेखक हजारी प्रसार द्विवेदी जी की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है कि भारतीय चित्र जो आज "अधीनता" को रूप में न सोचकर । स्वाधीनता के रूप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। वह संस्कार "स्व" के बंधन को असानी से छोड़ नहीं सकता। अपने-आप पर अपने आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है।


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